मेरा नाम आकाश है। उम्र अट्ठाईस साल। जयपुर में एक सरकारी स्कूल में पढ़ाता हूँ। कद छोटा है—पाँच फुट चार इंच—लेकिन लिंग छह इंच लंबा और दो इंच मोटा है। सात महीने पहले से मेरी ज़िंदगी में एक नई बेचैनी शुरू हुई थी।
हर सुबह जब मैं स्कूल जाता, तो रास्ते में एक किराना दुकान आती। वहाँ एक छोटी कद-काठी वाली, लेकिन बेहद गोली-गोली औरत आती थी। गेहूँ छानने का काम करती थी। उसका नाम शोभा था। उम्र तेईस साल। शादीशुदा।
पहले-पहले मैं सिर्फ देखता था। उसकी पीठ पर पसीने की बूँदें चमकतीं, ब्लाउज़ के नीचे से ब्रा की लाइन दिखती, और जब वह झुककर गेहूँ छानती, तो उसकी गोल-गोल गांड मेरी तरफ़ उभर आती। मेरे अंदर का हथियार बेचैन हो जाता।
रात को बिस्तर पर लेटकर मैं कल्पना करता कि वह मेरे नीचे है, मेरी मोटी लंड उसकी चूत में घुसा हुआ है।
धीरे-धीरे हिम्मत बढ़ी। एक दिन दुकानदार से पूछा, “ये औरत कौन है?” उसने बताया कि शोभा पास के कारखाने में काम करने वाले एक मज़दूर की बीवी है। पति सुबह सात बजे निकल जाता और रात नौ बजे लौटता। दिन भर शोभा खाली रहती।
मैंने शोभा से बात शुरू की। पहले छोटी-मोटी। फिर पूछा, “घर पर कोई काम करोगी?” उसने कहा, “आपके घर में कौन-कौन रहता है?” मैंने बताया—माँ, बाप और छोटा भाई। उसने सिर हिलाया, “नहीं सर, वहाँ तो अकेले रहना मुश्किल होगा।”
मैंने रणनीति बदली। हर बार मिलने पर बीस-पचास रुपये का नोट थमाने लगा। पहले तो मना करती, फिर लेने लगी। एक दिन मैंने साफ़ कहा, “शोभा, मुझे तुम्हें चोदना है।” वह हँस पड़ी। “सर, इतना सीधा?” “हाँ, सीधा।” “ठीक है सर, जहाँ ले जाओगे वहीं चोद लेना।”
मैंने शहर के किनारे एक सस्ता होटल ढूँढा। दो घंटे के लिए पाँच सौ रुपये। “शॉर्ट टाइम” बोलते हैं। अगले दिन स्कूल की छुट्टी थी। सुबह नौ बजे शोभा का फोन आया—“क्रॉसिंग पर पहुँच गई हूँ।” मैं बाइक पर निकल पड़ा।
होटल के बाहर मैंने उसे पहले अंदर भेजा। रिसेप्शनिस्ट ने पैसे लिए और चाबी थमाई—“रूम नंबर 2।” मैं ऊपर गया। दरवाज़ा बंद किया। शोभा खड़ी थी, हाथों में दुपट्टा समेटे। शर्माती हुई दुल्हन जैसी लग रही थी।
मैंने उसे गले लगाया। उसका शरीर काँप रहा था। मैंने उसके होंठों पर होंठ रख दिए। जीभें आपस में उलझ गईं। लार की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। मेरे हाथ उसके ब्लाउज़ के अंदर घुस गए। ब्रा के हुक खोले। ब्लाउज़ उतारा।
दो भारी, गोल स्तन बाहर निकले। निप्पल छोटे-छोटे, गहरे रंग के। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा। शोभा की साँस तेज़ हो गई। “आह्ह… सर…”
मैंने पेटीकोट की डोरी खोली। पेटीकोट गिरा। फिर पैंटी। उसकी चूत पूरी तरह साफ़ मुंडी हुई थी। त्वचा साँवली लेकिन चमकदार। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। पूरे शरीर पर किस करने लगा। जब चूत के पास पहुँचा तो उसने जाँघें बंद कर लीं। “नहीं सर, वो मत करो। मुझे अच्छा नहीं लगता।”
मैंने मना नहीं किया। वह खुद मेरी पैंट खोलकर मेरी लंड बाहर निकालकर मुँह में ले गई। उसकी जीभ मेरे लंड के नीचे घूम रही थी। चूसने का तरीका ऐसा था जैसे रोज़ करती हो। पाँच मिनट में ही मेरा पानी निकल गया। गरम-गरम वीर्य उसके स्तनों पर गिरा।
शोभा हँसकर उठी। तौलिए से साफ़ किया। फिर मेरी लंड को हाथ में लेकर सहलाने लगी। धीरे-धीरे फिर खड़ी हो गई। मैंने कंडोम पहना। शोभा ने लेटकर टाँगें फैलाईं। उसकी चूत के होठ पहले से ही चमक रहे थे। मैंने लंड का सिरा चूत के मुँह पर रखा और जोर से धक्का मारा। पूरी लंड अंदर घुस गई।
“आह्ह्ह… सर… मोटी है आपकी…”
मैंने जोर-जोर से चोदना शुरू किया। बिस्तर की लकड़ी चरमरा रही थी। शोभा के स्तन ऊपर-नीचे उछल रहे थे। दस मिनट में उसका पहला झड़ना हुआ। शरीर ऐंठ गया। “सर… सर… हो गया…” फिर दो मिनट बाद दूसरा।
मैंने निकालकर कहा, “घोड़ी बन जाओ।” शोभा समझ गई। घुटनों के बल बैठ गई। गांड ऊपर उठा दी। मैंने कंडोम अभी भी लगाया हुआ था। लंड का सिरा उसकी गांड के छेद पर रखा। धीरे-धीरे दबाव डाला। शोभा चीख पड़ी। “सर… दर्द हो रहा…” लेकिन मैं रुका नहीं। आधा लंड अंदर चला गया। फिर पूरा।
मैंने उसकी कमर पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारे। शोभा का मुँह तकिये में दबा हुआ था। “आह्ह… आह्ह… सर… फाड़ दोगे…” पंद्रह मिनट बाद मेरा दूसरा झड़ना हुआ। कंडोम के अंदर ही वीर्य भर गया।
हम दोनों थककर गिर पड़े। आधा घंटा आराम किया। फिर कपड़े पहने। शोभा ने पैसे लेने से इनकार कर दिया। “सर, पैसे से ज़्यादा कीमत तो ये चुदाई है। पति महीनों से हाथ भी नहीं लगाता।”
हम अलग-अलग निकले। रिसेप्शनिस्ट ने यही कहा था।
उस दिन के बाद से हम जब-तब मिलते हैं। कभी होटल, कभी मेरे दोस्त के खाली मकान में। मैं उसे पैसे भी देता हूँ, कपड़े भी खरीदता हूँ। और वह मुझे अपनी चूत और गांड दोनों सौंपती है।
कभी-कभी वह खुद फोन करके कहती है, “सर, आज चूत बहुत खुजला रही है। आ जाओ।” मैं स्कूल से छुट्टी लेकर निकल पड़ता हूँ।
एक बार हमने दो घंटे में तीन बार चोदा। पहली बार चूत में, दूसरी बार गांड में, तीसरी बार फिर चूत में। शोभा का शरीर लाल हो गया था। निप्पल सूज गए थे। लेकिन वह मुस्कुरा रही थी। “सर, आज तो पूरा क़र्ज़ चुका दिया।”
मैं हँसता हूँ। “क़र्ज़ तो अभी बहुत बाकी है शोभा।”
वह भी हँसती है। “तो फिर कल मिलते हैं सर।”
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