मेरा नाम मोहन है। उम्र इक्कीस साल। मैं लखनऊ के पास एक छोटे से कस्बे में रहता हूँ। पिताजी किसान हैं, माँ घर संभालती हैं। मेरे पास एक छोटी-सी इंश्योरेंस एजेंसी है। दो साल पहले एक दोपहर मेरे ऑफिस में एक अधेड़ आदमी आया।
उसका नाम रामलाल था। उसकी पत्नी का इंश्योरेंस क्लेम अटका हुआ था। मैंने उसके कागजात देखे, फाइल पूरी की और दो हफ्ते में पैसा उसके अकाउंट में पहुँचा दिया।
रामलाल खुश होकर बोला, “बेटा, तुमने मेरी बड़ी मदद की। मेरे घर आओ, खाना खाओ।” मैंने मना किया, लेकिन वह जिद करने लगा। अगले रविवार को मैं उसके गाँव चला गया। गाँव जिले से पच्चीस किलोमीटर दूर था।
रामलाल के घर पहुँचकर मैंने देखा कि उनकी बेटी डब्बू चाय लेकर आई। डब्बू पाँच फुट की थी, रंग साँवला, आँखें बड़ी-बड़ी, होंठ पतले। उसकी उम्र उन्नीस साल थी। शरीर दुबला-पतला, कमर पतली, छाती २८ इंच की। उसने हल्का-सा लिपस्टिक लगाया था।
चाय पीते हुए रामलाल ने बताया कि डब्बू की माँ दो साल पहले गुजर चुकी है। डब्बू अकेले घर संभालती है। मैंने डब्बू से बात की। उसकी आवाज में एक खास मिठास थी।
घर लौटते समय मैंने रामलाल से डब्बू का नंबर लिया। रात को मैंने डब्बू को मैसेज किया। उसने जवाब दिया। अगले दिन फोन पर बात हुई। बातें लंबी होती गईं। रोज रात को घंटे भर बात होती।
एक दिन मैंने सीधा पूछ लिया, “डब्बू, क्या तुम मेरी गर्लफ्रेंड बनोगी?”
डब्बू हँस पड़ी, “मोहन, दोस्ती तो ठीक है, लेकिन गर्लफ्रेंड वाली बात अभी नहीं।”
मैंने हार नहीं मानी। रोज फोन पर बात जारी रही। दो साल बीत गए। हम दोनों एक-दूसरे को अच्छे से जान चुके थे।
फिर एक दिन डब्बू ने कहा, “मोहन, मैं लखनऊ आ रही हूँ। बस स्टैंड पर मिलना।”
मैं बस स्टैंड पहुँचा। डब्बू लाल सलवार-कुर्ता पहने उतरी। उसके साथ एक सहेली भी थी। सहेली ने डब्बू के होंठों पर लिपस्टिक लगाई थी। डब्बू ने मुझे देखते ही शरमा कर सिर झुका लिया।
मैंने दोनों को चाय पिलाई। सहेली चली गई। अब डब्बू मेरे साथ अकेली थी।
मैंने कहा, “आज पूरा दिन घूमते हैं।”
डब्बू बोली, “ठीक है।”
हमने बाइक पर जयपुर हाईवे पकड़ लिया। हवा तेज चल रही थी। डब्बू मेरी पीठ से सटी हुई थी। उसकी छाती मेरी पीठ से छू रही थी। दोपहर को हम एक ढाबे पर खाना खाया। शाम को वापस लौटते समय मैंने एक होटल में रूम बुक कर लिया।
डब्बू ने पूछा, “यहाँ क्यों रुके?”
मैंने कहा, “थक गए हैं। थोड़ा आराम कर लेंगे।”
रूम में घुसते ही मैंने डब्बू को दीवार से लगा लिया। उसके होंठों पर अपना मुँह रख दिया। डब्बू ने भी होंठ आगे बढ़ाए। हमारी जीभें एक-दूसरे के मुँह में घुस गईं।
मैंने डब्बू की कुर्ती के बटन खोले। अंदर हल्का-सा ब्रा था। मैंने ब्रा का हुक खोला। डब्बू की छोटी-छोटी मलाई जैसी छातियाँ बाहर आ गईं। मैंने एक चूची मुँह में लेकर चूसना शुरू किया। डब्बू की साँस तेज हो गई।
मैंने सलवार की नाड़ भी खींच दी। डब्बू की सलवार जाँघों तक उतर आई। अंदर सफेद पैंटी थी। मैंने पैंटी भी उतार दी। अब डब्बू पूरी तरह नंगी मेरे सामने खड़ी थी।
मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसके दोनों पैर खोलकर उसके चूत के पास मुँह ले गया। चूत के बाल घने थे। मैंने जीभ निकालकर चूत के फटे पर चाटना शुरू किया। डब्बू का शरीर काँपने लगा।
“आह… मोहन… क्या कर रहे हो…” डब्बू चीखी।
मैंने चूत के अंदर जीभ डालकर ऊपर-नीचे करने लगा। डब्बू की चूत से रस निकल रहा था। मैंने दस मिनट तक चूत चाटी। डब्बू के दोनों हाथ मेरे बालों में उलझ गए।
फिर मैं ऊपर आया। डब्बू की छातियों को दोनों हाथों से दबाने लगा। चूचियाँ लाल हो गईं। मैंने एक चूची को मुँह में लेकर जोर से चूसा। डब्बू की कमर ऊपर उठने लगी।
“मोहन… मुझे कुछ हो रहा है…” डब्बू बोली।
मैंने अपनी पैंट उतारी। मेरा लंड आठ इंच का, मोटा, नसों से भरा बाहर आ गया। डब्बू ने पहली बार किसी लंड को देखा। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
“यह… इतना बड़ा?” डब्बू ने डरते हुए कहा।
“डर मत, धीरे-धीरे डालूँगा।” मैंने जवाब दिया।
मैंने डब्बू के दोनों पैर खोले। लंड की नोक उसकी चूत के मुँह पर रखा। डब्बू ने हाथ जोड़कर कहा, “मोहन, यह मेरी पहली बार है। बहुत दर्द होगा। धीरे करना।”
मैंने एक हल्का-सा धक्का मारा। लंड का सिरा चूत के अंदर घुसा। डब्बू चीख पड़ी।
“आह… मर गई… निकालो… बहुत दर्द हो रहा है…”
मैंने रुककर डब्बू के होंठों पर मुँह रख दिया। जीभ से उसकी जीभ चाटने लगा। फिर दूसरा धक्का मारा। आधा लंड अंदर चला गया। डब्बू की आँखों से आँसू निकल आए।
“मोहन… निकालो… हाथ जोड़ती हूँ…” डब्बू रोने लगी।
मैंने डब्बू को चूमते हुए तीसरा जोरदार धक्का मारा। पूरा लंड चूत के अंदर घुस गया। डब्बू का शरीर अकड़ गया। चूत से खून निकलने लगा।
मैंने लंड बाहर नहीं निकाला। डब्बू के स्तनों को चूसते हुए धीरे-धीरे आगे-पीछे करने लगा। दस मिनट बाद डब्बू की चीखें कम हुईं।
“मोहन… अब दर्द कम हो रहा है…” डब्बू बोली।
मैंने रफ्तार बढ़ा दी। लंड चूत के अंदर-बाहर होने लगा। “चुप-चुप” की आवाजें आने लगीं। डब्बू की साँसें तेज हो गईं।
“मोहन… और जोर से… और तेज…” डब्बू चीखने लगी।
मैंने डब्बू के दोनों पैर अपने कंधों पर रखे। लंड पूरी ताकत से अंदर-बाहर करने लगा। डब्बू का शरीर काँपने लगा।
“मोहन… मैं… मैं झड़ रही हूँ…” डब्बू का शरीर अकड़ गया। उसकी चूत ने मेरे लंड को कस लिया।
मैंने बीस मिनट तक चोदता रहा। फिर मेरा लंड फड़कने लगा।
“डब्बू… मैं झड़ने वाला हूँ…” मैंने कहा।
“अंदर ही छोड़ दो…” डब्बू बोली।
मैंने जोर से धक्का मारा और डब्बू की चूत के अंदर गाढ़ा वीर्य छोड़ दिया। वीर्य चूत से बाहर निकलकर चादर पर गिरने लगा।
जब मैंने लंड बाहर निकाला तो पूरा लंड खून से लथपथ था। डब्बू डर गई।
“मोहन… यह खून क्यों लगा है?” डब्बू ने पूछा।
“पहली बार चुदाई में खून आना normal है।” मैंने समझाया।
डब्बू शांत हो गई। हम दोनों बाथरूम में जाकर साफ हुए।
उस दिन के बाद डब्बू और मैं अक्सर मिलने लगे। हर बार नया कमरा, नई चुदाई। डब्बू अब चुदाई का पूरा मजा लेती है।