खाला की जवान बेटी को चोदा

(Khala Ki Javaan Beti Ko Choda)

मेरा नाम जावेद है। मैं आंध्र प्रदेश का रहने वाला हूं, उम्र 21 साल, एक स्नातक छात्र। मेरी बॉडी एथलेटिक है, लेकिन सबसे खास बात मेरी लंबी और मोटी लंड है, जो 8 इंच लंबी और मोटाई में किसी सिलेंडर जैसी। गर्मियों की छुट्टियों में मैं अपने दादाजी के गांव कडपा चला गया।

वहां का मौसम गर्म था, हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू, और दूर-दूर तक हरे-भरे खेत। दादाजी का घर पुराना था, लेकिन मेरी खाला का परिवार पास ही रहता था। खाला की दो बेटियां थीं—फरीदा, 19 साल की, और करिश्मा, 18 साल की। साथ में दो छोटे बच्चे भी।

फरीदा मेरी कजिन थी, लेकिन हम उसे बड़ी बहन की तरह मानते थे। वह आलसी स्वभाव की थी, देर तक सोती, लेकिन उसका फिगर कमाल का था—28-24-36। गोरी चमड़ी, पतली कमर, भरी हुई छाती जहां दो बड़ी-बड़ी चुचियां हमेशा उछलती रहतीं, और नीचे मोटी गांड जो चलते समय लहराती।

मुझे इंटरनेट पर सेक्स स्टोरीज पढ़ने का शौक था। खासकर रिश्तेदारों के बीच की वो गर्मागर्म कहानियां, जहां भाई-बहन या कजिन एक-दूसरे को चाटते, चूसते और चोदते। गांव आते ही मेरा मन बेचैन हो गया। खाला के घर टीवी देखने का बहाना बनाकर जाता। वहां फरीदा झाड़ू लगाती।

उसकी कुर्ती टाइट थी, हर झाड़ू के झटके के साथ चुचियां उछलतीं। मैं सोफे पर बैठा घूरता रहता। एक दिन सुबह-सुबह वह झाड़ू मार रही थी। कुर्ती का गला नीचे सरक गया। अंदर काली ब्रा, और उसके ऊपर से निप्पल की आकृति साफ दिख रही।

मेरा लंड तनने लगा। वह झुक गई तो गांड की शेप उभर आई—गोल, मोटी, जैसे किसी परफेक्ट आइसक्रीम। मेरी सांसें तेज हो गईं। मैंने पैंट के ऊपर से ही लंड को दबाया।

“फरीदा, क्या कर रही हो?” मैंने पूछा, आवाज में छिपी वासना को कंट्रोल करते हुए।

वह मुड़ी, मुस्कुराई। “भाईया, बस सफाई। तुम्हें कुछ चाहिए?”

उसकी मुस्कान में कुछ था—लेकिन आंखों में चमक। मैंने कहा, “नहीं, बस टीवी देख रहा हूं।” लेकिन नजरें उसकी चुचियों पर टिकी रहीं। वह फिर झुकी, और इस बार कुर्ती और नीचे सरक गई। ब्रा का स्ट्रैप कंधे से फिसला। निप्पल का गुलाबी रंग झांकने लगा।

मेरा लंड अब पूरी तरह खड़ा हो गया, पैंट फाड़ने को तैयार। मैंने कल्पना की—उसे नंगा करके चुचियां चूसना, लंड उसके मुंह में ठूंसना।

गांव में तालाब था, जहां सब नहाने जाते। मैंने फरीदा को स्विमिंग सिखाने का बहाना बनाया। “फरीदा, चलो तालाब चलें। मैं तैरना सिखा दूंगा।” वह खुश हो गई।

सब तैयार हुए—खाला, करिश्मा, बच्चे। फरीदा ने पारदर्शी कुर्ता और पेटीकोट पहना। कुर्ता पतला था, अंदर ब्रा-पैंटी की शेप साफ। तालाब का पानी ठंडा था, लेकिन धूप तेज। हम किनारे पर उतरे।

फरीदा पानी में कूद पड़ी, लेकिन तैर नहीं पाती। मैंने हाथ पकड़ा, “आओ, मैं पकड़ता हूं।”

पानी में वह तैरने की कोशिश कर रही थी। अचानक उसकी चुन्नी पानी में फंस गई। कुर्ता भीग गया, पारदर्शी हो गया। अब ब्रा साफ दिख रही—काली, चुचियां दबाव में उभरी हुईं। नीचे पेटीकोट भी भीगा, पैंटी की लाइन नजर आ रही। मैंने पानी के नीचे देखा—उसकी गांड की शेप, चूत की आकृति।

मेरा लंड पानी में ही तन गया। वह मेरी ओर आई, “भाईया, डर लग रहा है।” मैंने कमर पकड़ी। उसकी कमर नरम, गर्म। हाथ ऊपर सरके, चुचियों को छुआ। वह सिहर गई, लेकिन हती नहीं।

“फरीदा, तैरना सीखना है तो डरो मत।” मैंने कहा, और उसे पानी में खींचा। वह मेरी छाती से चिपक गई। उसके निप्पल मेरी बॉडी पर रगड़ रहे। उत्तेजना चरम पर। अचानक वह पानी में फिसली, मेरी गांड पकड़ ली। “ओह!” वह चिल्लाई। मैं मुड़ा, उसकी आंखों में वही चमक।

“भाईया, तुम्हारी बॉडी कितनी स्ट्रॉन्ग है।” उसके हाथ मेरी जांघों पर। मैंने सोचा, अब मौका है। सब दूर थे, बच्चे खेल रहे। मैंने अपना लंड बाहर निकाला—पानी में छिपा। सीधे उसकी टाइट चूत की ओर दबाया। पेटीकोट ऊपर किया, पैंटी साइड।

“क्या कर रहे हो?” वह फुसफुसाई, लेकिन आंखें बंद। मैंने धक्का दिया। लंड का सिरा चूत में घुसा। टाइट थी, जैसे पहली बार। दर्द से वह चीखी, “आह! दर्द हो रहा है।”

लेकिन मैं रुका नहीं। पूरा लंड अंदर ठूंस दिया। खून बहने लगा, पानी लाल। वह कांप रही थी, लेकिन चिपक गई। “भाईया, धीरे…” मैंने चुदाई शुरू की—जोर-जोर से। पानी छपछपा रहा। उसकी चूत गीली हो गई, दर्द में सुख मिला। वह मेरी पीठ में नाखून गाड़ रही। “और जोर से… चोदो मुझे।”

हमने पानी में ही विभिन्न पोजीशन ट्राई कीं। पहले मैंने उसे सीधा पकड़कर लंड अंदर-बाहर किया। चुचियां दबाईं, निप्पल चूसे। वह मेरे कंधे पर सिर रगड़ रही। फिर उसे पलटा, पीछे से गांड पकड़ी। लंड चूत में फिर घुसेड़ा। वह चीखी, लेकिन पीछे धकेल रही।

“हां, भाईया, गांड मारो।” मैंने गांड पर थप्पड़ मारे। लाल हो गई। अंत में लंड बाहर निकाला, उसके चेहरे पर मुँह खुलवाया। गाढ़ा माल झाड़ दिया—चेहरे, चुचियों पर। वह चाट रही, “तुम्हारा मक्खन स्वादिष्ट है।”

फरीदा अब मेरी गुलाम बन गई। हर इच्छा पूरी करती। शाम को खेतों में मिले। खेत ऊंचे गन्ने से भरे, छिपने को जगह। वह आई, कुर्ता ऊपर किया। “भाईया, चोदो मुझे।” मैंने उसे जमीन पर लिटाया। चूत चाटी—गीली, स्वाद मीठा। जीभ अंदर डाली। वह कसमसाई, “आह… सुई जैसा लग रहा।

फिर लंड मुंह में दिया। वह चूसी, गले तक। मैंने सिर पकड़कर ठोक दिया। फिर चुदाई—मिशनरी में। लंड गहराई तक। वह चीखती, “फाड़ दो चूत।” दर्द सहते हुए उत्तेजना।

रात को घर के पीछे। सब सो गए। वह चुपके आई। मैंने गांड खोली। पहली बार गांड मारी। तेल लगाया, धीरे घुसेड़ा। “दर्द!” वह रोई, लेकिन सहन किया। पूरा अंदर। पीछे से पेला। गांड कड़ी, टाइट थी। वह दर्द में चिल्लाई, लेकिन “और…” कहती।

मैंने चुचियां पीछे से दबाईं। स्पीड बढ़ाई। अंत में गांड में ही झाड़ दिया। गर्म माल। वह थरथरा रही, “तुम्हारा गुलाम हूं।”

अगले दिन तालाब फिर। लेकिन इस बार अकेले। वह नंगी उतरी। बॉडी चमक रही। मैंने चूसा—चुचियां, निप्पल कड़े। चूत चाटी, क्लिटोरिस चूसा।

वह पानी में तैरते हुए चिल्लाई। फिर पानी के ऊपर चुदाई। लंड अंदर, पानी छलकता। विभिन्न एंगल—साइड, डॉगी। वह मेरे लंड को चूसती, गले में लेती। “भाईया, तुम्हारा लंड कमाल का।” हम घंटों।

कई हफ्ते ऐसे। हर जगह—खेत, तालाब, घर, जंगल। पोजीशन बदलते—69, काउगर्ल, रिवर्स। वह चूसती, चाटती। मैं चोदता, पीटता। दर्द हमेशा, लेकिन उत्तेजना ज्यादा।

फरीदा खुल चूकी थी—सब कुछ देती। हमारी वासना कभी न खत्म हुई। गांव छोड़ते समय वादा किया—फिर मिलेंगे।