राशन के बदले जिस्म का सौदा

(Rashan Ke Badle Jism Ka Sauda)

दोस्तों, मेरा नाम शकीना है। मैं एक गरीब बेसहारा औरत हूँ। उम्र 32 की लग गयी है। मेरे आदमी ने मुझे चोद चोदके 2 बच्चों को पैदा कर दिया। फिर वो हरामी शराब पी पीकर मर गया और मुझे 2 बच्चों की जिम्मेदारी दे गया। मैं अब भी जवान और खूबसूरत हूँ। मेरी त्वचा गेहुंए रंग की है, चूचियाँ भरी हुईं, कमर पतली और गांड गोल। लेकिन गरीबी ने सब कुछ छीन लिया।

घर में चूल्हा जलाने को लकड़ी नहीं, बच्चों के कपड़े फटे हुए। मैं मजदूरी करती हूँ, लेकिन वो भी मिलती नहीं। भूख ने मुझे तोड़ दिया। आज मैं किराना दुकान वाले लाला के पास गई। वो 50 साल का मोटा आदमी, हमेशा मेरी बॉडी पर लार टपकाता है। मैंने फैसला किया – राशन के बदले जिस्म दूँगी।

सुबह-सुबह मैंने साड़ी पहनी, पुरानी सी लेकिन साफ। बच्चे सो रहे थे, छोटा वाला 5 साल का, बड़ा 8 का। मैंने उन्हें चुपके से चावल का आधा कटोरा दिया, जो कल बचा था। ‘माँ जल्दी लौटूँगी,’ मैंने कहा और बाहर निकल पड़ी। गली में धूल उड़ रही थी, सूरज तप रहा था। दुकान पर पहुँचकर मैंने देखा लाला अकेला बैठा है।

उसके चेहरे पर वो वही चालाकी वाली मुस्कान। ‘क्या चाहिए शकीना?’ उसने पूछा, आँखें मेरी छाती पर टिके हुए। मैंने सिर झुकाया, ‘लाला जी, आटा, चावल, दाल – बच्चों के लिए। पैसे नहीं हैं अभी।’ वो हँसा, ‘पैसे नहीं? तो क्या दोगी?’ मैं चुप रही, लेकिन दिल धड़क रहा था।

वो दुकान का शटर नीचे करने लगा। ‘आ जा अंदर, बात करते हैं।’ मैं अंदर गई। दुकान के पीछे एक छोटा सा गोदाम था, जहाँ सामान रखा होता था। वो मुझे वहाँ ले गया। हवा में सड़ांध की महक। ‘बोल, क्या सौदा?’ उसने कहा, हाथ मेरी कमर पर रखते हुए।

मैंने आँखें बंद कीं, ‘जो आप कहें, बस राशन दे दीजिए। एक महीने का।’ वो खुश हो गया। ‘ठीक है, लेकिन तेरी चूत और गांड मेरी। रोज आना पड़ेगा, वरना सौदा तोड़ दूँगा।’ मैंने हामी भरी। शर्म से चेहरा लाल हो गया, लेकिन बच्चों की भूख ने मुझे मजबूर कर दिया।

लाला ने मेरी साड़ी का आँचल खींचा। ब्लाउज के हुक खोले। मेरी चूचियाँ बाहर आ गईं – भारी, निप्पल सख्त हो चुके। वो झपटा और एक चूची मुँह में ले लिया। जोर से चूसा, दाँतों से काटा। ‘आह!’ मैं सिसकी। दर्द हुआ, लेकिन गर्मी भी लगी। दूसरी चूची पर हाथ मला, निप्पल को मरोड़ दिया। ‘तेरी चूचियाँ तो दूध वाली हैं अभी भी,’ वो बोला।

मैं खड़ी रही, साँसें तेज। फिर उसने पेटीकोट ऊपर किया, पैंटी पर हाथ फेरा। चूत गीली हो चुकी थी। ‘साली, तैयार हो गई,’ वो हँसा। पैंटी उतारी और अपनी धोती खोली। लंड बाहर कूदा – लंबा, मोटा, सिरा चमकदार।

मुझे दीवार से सटा दिया। लंड को चूत पर रगड़ा। ‘ले, चोदता हूँ तुझे।’ एक झटके में अंदर धकेल दिया। चूत फटने लगी। ‘ओह्ह!’ मैं चीखी। वो ठोकने लगा – जोरदार धक्के। पच-पच की आवाज। उसके पेट का मोटापा मेरी चूचियों पर चिपक रहा था। हाथ गांड पर पड़े, चपचप मारने लगा। ‘कितनी टाइट चूत है तेरी, विधवा रंडी।’ वो हाँफा। मैं दर्द से तड़पी, लेकिन चूत में गर्मी फैल गई। पाँच मिनट बाद वो तेज हुआ। ‘आ गया!’ और गरम वीर्य चूत में उंडेल दिया। मैं लुढ़क गई। वो उठा, बोरा पैक किया। ‘कल सुबह आना।’

घर लौटी तो बच्चे जाग चुके थे। मैंने अनाज पकाया, खिला दिया। लेकिन मन भारी था। रात को सो नहीं सकी। कल फिर जाना है। लाला की भूख तो जानवर जैसी। दूसरे दिन सुबह उठी। बच्चे खेल रहे थे। मैंने कहा, ‘माँ बाजार जा रही हूँ।’ दुकान पर पहुँची। लाला इंतजार कर रहा था। ‘आ गई रंडी? आज गांड मारूँगा।’ शटर नीचे, पीछे ले गया।

साड़ी उतारी नंगी कर दिया। मुझे घुटनों पर बिठाया। लंड मुँह के पास लाया। ‘चूस।’ मैंने मुँह खोला, लंड अंदर लिया। जीभ से चाटा, चूसा। वो सिर पकड़कर गले तक ठोकने लगा। ‘गले में ले, साली।’ गला भर आया, आँसू निकले। दस मिनट चूसा तो वो बोला, ‘अब गांड।’

मुझे उकसाया, गांड ऊपर की। उंगली से चूत का रस निकालकर गांड पर लगाया। लंड सिरा दबाया। ‘दर्द होगा, सह ले।’ धकेला। गांड फट गई। ‘आह्ह!’ चीखी मैं। वो ठोकने लगा – धीरे-धीरे फिर तेज। गांड जल रही थी। हाथ चूचियों पर, मरोड़ता रहा। ‘तेरी गांड भी टाइट, मजा आया।’ बीस मिनट बाद वीर्य गांड में। मैं थककर लेटी। वो अनाज दिया।

तीसरे दिन मैं डर रही थी। लेकिन जाना पड़ा। लाला ने कहा, ‘आज पूरा दिन रुक।’ दुकान बंद कर दी। मुझे हाथ ऊपर नंगा करके बाँध दिया। फिर चूचियों पर थप्पड़ मारे। निप्पल चूसे। चूत में उंगली डाली, तेजी से हिलाई। मैं गीली हो गई, सिसकियाँ लेने लगी। ‘मजा आ रहा है ना रंडी?’ लंड चूत में डाला, खड़ा करके चोदा।

दीवार से सटाकर, फिर फर्श पर। ऊपर चढ़कर ठोका। चूत लाल हो गई। वीर्य बाहर निकाला, चूचियों पर गिराया। ‘चाट ले।’ मैंने चाटा। शाम तक तीन बार चोदा – चूत, गांड, मुँह। अनाज का ढेर लगा दिया।

चौथे दिन बच्चे बीमार हो गए। छोटे को बुखार। मैं दवा के लिए गई, लेकिन लाला ने कहा, ‘पहले सौदा पूरा।’ मुझे दुकान के काउंटर पर लिटाया। पैर फैलाए, चूत चाटने लगा। जीभ अंदर डाली, चूसता रहा। मैं तड़पी, ‘लाला जी, जल्दी।’ लेकिन वो हँसा। लंड डाला, जोर से ठोका। बच्चे का ख्याल आया, आँसू बहने लगे। वीर्य के बाद दवा दी। घर जाकर बच्चे को खिला। रात को रोई। लेकिन गरीबी ने बाँध रखा।

दिन बीतते गए। हर रोज नया तरीका। कभी खड़ा करके, कभी लेटाकर। चूचियाँ काटीं, गांड पर थप्पड़। चूत में उंगलियाँ। वीर्य पीने को मजबूर किया। लेकिन अनाज मिलता रहा। बच्चे स्वस्थ हो गए। मेरी भी आदत पड़ गई। लाला की चोदाई में गर्मी लगने लगी।

कभी-कभी मैं खुद माँगने लगी। ‘लाला जी, और जोर से।’ वो हँसता। महीना पूरा हुआ। सौदा खत्म। गरीबी ने मुझे उसकी गुलाम बना दिया।